धमतरी में कथित सौदेबाजी पत्रकारिता की बढ़ती चर्चाओं ने खड़े किये बड़े सवाल..


धमतरी जिले में इन दिनों पत्रकारिता की आड़ में कथित ब्लैकमेलिंग और दबाव की राजनीति को लेकर चर्चाएं तेज हैं। विभिन्न वर्गों से ऐसी शिकायतें और आरोप सामने आ रहे हैं कि कुछ लोग स्वयं को पत्रकार या प्रभावशाली मीडिया प्रतिनिधि बताकर अधिकारियों, कर्मचारियों, जनप्रतिनिधियों, व्यापारियों और आम नागरिकों पर मानसिक दबाव बनाने का प्रयास करते हैं। आरोप यह भी हैं कि कई मामलों में बिना पर्याप्त तथ्य और संबंधित पक्ष का पक्ष जाने खबरों या वीडियो की श्रृंखला प्रसारित कर अप्रत्यक्ष रूप से समझौते का माहौल बनाया जाता है।


पत्रकारिता का धर्म सत्ता से सवाल पूछना है, सौदेबाजी करना नहीं। जब कलम सच के बजाय दबाव का माध्यम बनने लगे, तो सबसे बड़ा नुकसान लोकतंत्र और जनता के विश्वास का होता है। इसका असर उन सैकड़ों ईमानदार पत्रकारों पर भी पड़ता है, जो सीमित संसाधनों में जनहित की खबरों को सामने लाने का काम कर रहे हैं।



कथित तौर पर अपनाए जाने वाले तरीके

फोन कर खबर चलाने या कार्रवाई कराने की धमकी देना।

बिना पर्याप्त साक्ष्य खबरों या वीडियो की श्रृंखला चलाकर दबाव बनाना।

अधिकारी बनकर फोन कर पैसे की मांग करना..

संबंधित पक्ष का संस्करण लिए बिना आरोपों को प्रचारित करना।

अप्रत्यक्ष रूप से समझौते या सौदेबाजी के संकेत देना।

यदि ऐसे आरोप सही साबित होते हैं, तो यह केवल पत्रकारिता की मर्यादा का उल्लंघन नहीं, बल्कि परिस्थितियों के अनुसार कानून के तहत भी जांच और कार्रवाई का विषय हो सकता है।

ईमानदार पत्रकार भी हो रहे प्रभावित




धमतरी में वर्षों से अनेक पत्रकार निष्पक्ष, निर्भीक और जनहित में कार्य कर रहे हैं। लेकिन कुछ लोगों के कथित आचरण के कारण पूरे मीडिया जगत की छवि प्रभावित होती है। यही कारण है कि अब पत्रकार संगठनों से भी अपेक्षा की जा रही है कि वे वास्तविक पत्रकारिता और कथित ब्लैकमेलिंग के बीच स्पष्ट रेखा खींचें।

बड़े सवाल...

क्या पत्रकारिता की आड़ में होने वाली कथित ब्लैकमेलिंग पर अंकुश लगेगा?

क्या प्रशासन और पुलिस शिकायतों की निष्पक्ष जांच करेंगे?

क्या पत्रकार संगठन ऐसे मामलों में आत्मनियमन की ठोस पहल करेंगे?

क्या जनता का मीडिया पर भरोसा फिर उतना ही मजबूत रह पाएगा?

संपादकीय टिप्पणी



पत्रकारिता लोकतंत्र की आवाज़ है, भय का हथियार नहीं। यदि कोई व्यक्ति पत्रकारिता के नाम पर निजी लाभ, दबाव या कथित वसूली का प्रयास करता है, तो उसकी निष्पक्ष जांच होनी चाहिए। वहीं, बिना प्रमाण किसी पर आरोप लगाना भी उतना ही अनुचित है। इसलिए हर मामले में तथ्य, साक्ष्य और कानून की प्रक्रिया का पालन ही सबसे महत्वपूर्ण है। समाज को निर्भीक, निष्पक्ष और जवाबदेह पत्रकारिता चाहिए—ऐसी पत्रकारिता जो सच के साथ खड़ी हो, किसी सौदे के साथ नहीं।

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