धमतरी।झोलाछाप डॉक्टरों के चर्चे तो आपने सुना ही होगा अब आपको ऐसे ही झोला छाप पत्रकारों के किस्से कहानी से आपको अवगत कराते है।
देश में चौथे स्तंभ कही जाने वाली पत्रकारिता आज एक नए संकट से जूझ रही है…
जहां एक तरफ सच्ची और निष्पक्ष खबरों की जिम्मेदारी है…
वहीं दूसरी तरफ “झोला छाप पत्रकार” इस पेशे की साख पर सवाल खड़े कर रहे हैं…
बिना किसी मान्यता, बिना प्रशिक्षण… सिर्फ एक आईडी और कैमरे के सहारे
कुछ लोग पत्रकारिता के नाम पर वसूली और दबाव का खेल खेल रहे हैं…
गांव से लेकर शहर तक… इन दिनों ऐसे कथित पत्रकारों की संख्या तेजी से बढ़ रही है…
हाथ में माइक, गले में आईडी और जेब में मोबाइल कैमरा…
और फिर शुरू होता है “खबर” के नाम पर सौदेबाजी का खेल…
दुकानदार हो, ठेकेदार हो या सरकारी कर्मचारी…
छोटी-छोटी कमियों को दिखाकर डराना..आरटीआई लगाना और फिर मामला “सेटल” करना…
यही बन गया है कुछ लोगों का धंधा…
सूत्रों की माने तो कुछ व्यवसायी या अधिकारियों को दो टूक में ये तथाकथित झोलाछाप पत्रकार धमकी देते है कि इतनी व्यवस्था कर दीजिए नहीं तो आपकी खबर चला देंगे… नहीं देने पर बदनाम करने की भी धमकी देते हैं…”
ऐसे झोला छाप पत्रकारों की वजह से असली पत्रकारों की छवि भी धूमिल हो रही है…
जो लोग दिन-रात मेहनत कर सच्चाई सामने लाते हैं…
उन्हें भी अब शक की नजर से देखा जाने लगा है…
वरिष्ठ पत्रकार कमलेश पांडे और उमेश वशिष्ठ का कहना है कि पत्रकारिता के क्षेत्र में आने के लिए उचित शिक्षा, प्रशिक्षण और संस्थागत पहचान जरूरी है… साथ ही मीडिया संस्थानों को भी अपने प्रतिनिधियों की स्पष्ट सूची और पहचान सार्वजनिक करनी चाहिए…
“पत्रकारिता एक जिम्मेदारी है, लेकिन कुछ लोग इसे ब्लैकमेलिंग का जरिया बना रहे हैं… इस पर सख्त कार्रवाई होनी चाहिए…
प्रशासन का भी मानता है कि इस तरह के फर्जी पत्रकार समाज के लिए खतरा बनते जा रहे हैं…
ऐसे लोगों की पहचान और कार्रवाई के लिए समय-समय पर अभियान भी चलाए जाते हैं…
लेकिन सवाल ये है कि आखिर कब तक ये सिलसिला चलता रहेगा…?
जरूरत है पत्रकारिता को साफ-सुथरा बनाए रखने की…
सच्चे और फर्जी के बीच फर्क पहचानने की…
ताकि लोकतंत्र का चौथा स्तंभ अपनी विश्वसनीयता बनाए रख सके…क्योंकि कलम की ताकत अगर सच्चाई के लिए उठे… तो बदलाव लाती है…
और अगर गलत हाथों में चली जाए… तो भरोसा तोड़ देती है…स्थानीय प्रशासन और पुलिस के पास भी इस तरह की शिकायतें लगातार पहुंच रही हैं… लेकिन स्पष्ट नियमों और कड़ी कार्रवाई के अभाव में ऐसे लोगों के हौसले बुलंद हैं… पत्रकारिता को लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कहा जाता है… लेकिन इसी पेशे में अब “झोला छाप पत्रकारों” की बढ़ती संख्या गंभीर चिंता का विषय बनती जा रही है… बिना किसी प्रशिक्षण, मान्यता या संस्थागत जुड़ाव के खुद को पत्रकार बताने वाले ऐसे लोग न सिर्फ असली पत्रकारों की छवि धूमिल कर रहे हैं, बल्कि आम जनता को भी गुमराह कर रहे है।


